सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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क्यूँ____

क्यूँ आंखे वो मुझे लुभाती
क्यूँ मंत्र मुद्ध मैं हो जाती हूँ
भ्रम संदेहों को
निकाल हृदय से
क्यूँ भाव समर्पण से
भर जाती हूँ

भटकता मन निर्जन वन में
क्यूँ आँसू छलकाता है
क्यूँ याद कर उसे ये दिल
कभी रोता है मुस्काता है
क्यूँ हूक सी उठती है दिल में
क्यूँ आस का पंछी रोता है
जो नही मेरा देख उसे दिल
क्यूँ रह रह आहें भरता है
वो खुश है दुनियां में अपनी
दिल बैचेन मेरा क्यूँ रहता है
क्यूँ देखने को सूरत उसकी
आँखों का काजल पिघलता है

क्यूँ खेलता है दिल से कोई
क्यूँ पत्थर दिल कोई होता है
सोचता है अक़्सर मन ये मेरा
क्यूँ लेकर खुशियां प्रेम
दर्द हमे दे जाता है__|||

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मुँह चिढ़ाती तस्वीर__|||

कुछ ही पल तो हुए थे
वह अपनी तस्वीर जो
तुमने मुझे दी थी मुँह
चिढ़ाती हुई, अचानक
उस तस्वीर को देख मैं
अपनी हँसी रोक न पाई
यकीं सा हो चला था
तुम्हारे दिल में अपने होने का
तुम्हारे कहे हर शब्द का
नये साल में तुम्हारे बदलाव का
तुम्हारे प्यार की सच्चाई का
फिर कभी न छोड़ जाने के
वादे का ,तुम्हारे जीवन में
मेरी ज़रूरत का,एक तस्वीर
इक पल और ढ़ेरों ख़ुशफैमीयों
संग मैं बहुत खुश हो
हँस रही थी ,
लेकिन यह क्या
अभी तो मैं जी भर
हँसी भी न थी के तस्वीर ने
अपना भाव बदल लिया
होंठो की हँसी मेरी आँखों में
बन आँसू बहने लगा, अब 
रोज सुबह मुँह चिढ़ाती
तुम्हारी तस्वीर तुममें
मुझे मेरे वज़ूद का
अहसास करा जाती है
और मैं बहा चंद आँसू के कतरे
खुदको व्यस्त कर दर्द से बचने
की अथाह कोशिशों में लग जाती हूँ__|||#बसयूँही :)



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#बसयूँही

भ्रम में भ्रमित
भ्रमण करता रहा
यह दिल बसयूँही
भटकता रहा__


फिर वही खेल फिर वही तमाशा
बेइंतहां मुहब्बत और दर्द बेतहाशा__


निशा रात्रि के माथे पर

आँखे हैं दो धँसी हुई

अश्क़ों की लकीरें बनती है


दिल भारी भारी लगता है__


दर्द है मेरे सीने में आँखों में आसूँ है कहाँ छुपाऊँ ख़ुदको मैं के हर तरफ़ तू ही तू है__

आशंकाओं के साये में दिल कर रहा विलाप है अश्रुओं की धार बह चली व्याकुल ये मन संसार है__

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शब्दों के तुम कारीगर__|||


जो हो भूल कोई मुझसे प्रिये
तुम उन्हें अनदेखा किया करो
न मुँह मोड़ो यूँ छोड़ मुझे तुम
मेरे प्रेम को महसूस किया करो

हो शब्दों के तुम कारीग़र
मज़दूरी नित् किया करो
हूँ मैं ग़र कविता तेरी
तुम मेरा विस्तार करो~

तोड़ो मरोड़ो शब्दों को
जज़्बातों से मुझे जलाओ
अहसासों का मरहम लगा
एक रूप नया तुम दे जाओ~

प्यार से तराशो मुझे तुम
कभी लबों से गुनगुनाओ
महक उठे हर लफ़्ज़ मेरे
मुझे इत्र इश्क़ का लगा जाओ~

छंदों से मेरा श्रृंगार करो
अंलकार से मुझे सजाओ
गीत बना इश्क का मुझे 
होंठो से अपने मुझे लगाओ~

मैं बनके रचना तेरी
मन ही मन इठलाऊँ
कुछ ऐसा गढ़ रचनाकार मुझे
की मैं लबों पर तेरे छा मुस्काऊँ~|||


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स्नेह लिखो दुलार लिखो

तुम थे तुम हो तुम ही रहोगे
नफरत लिखो या प्यार लिखो
कहता है हमदम ये साल नया
तुम स्नेह लिखो दुलार लिखो
करते हो तुम सवाल बहुत
कभी तो अपना हाल लिखो
आती हूँ मैं याद तुम्हें भी
कुछ ऐसा इस साल लिखो
छोड़ो अब ये व्यथापुराण
आंसुओं का विवरण रहने दो
विपुलहर्ष ले नववर्ष आया
तुम हर धड़कन को प्रेम लिखो__|||💞

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एक सिक्का___|||

विदा लेते वर्ष ने
एक सिक्का रखा है
मेरी हथेली पे
उम्मीदों का
मैं बहुत खुश हूँ
पर डर ने मुझे
अपने घेरे में
कैद रक्खा है
ख़ौफ़ की जंजीरों से
बांध रखा है
मैं चाहती हूँ हँसना
अपनी खुशी
सबके संग बाँटना
पर बीते वक़्त के
निष्ठुर हवा के
थपेड़ों ने मुझे
तोड़ रक्खा है
अंदेशा के घने
बादलों ने मुझे
घेर रक्खा है
चुपचाप ख़ामोश
मैं भींच हथेली
ये सिक्के वाली
सीने से लगा
सबकी नज़रों से
बचा...नववर्ष में
प्रवेश करना चाहती हूँ
ताकि दे सकूँ फिर इक
प्रलोभन नया
आने वाले समय में
अपने दिल को
तुम्हारे साथ का
अपने विस्वास का
हमारे प्रेम के
इस मधुर अहसास का___|||#बसयूँही

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तुम संग___|||

तुम्हारा स्पर्श
और वो सुक़ून
भरा अहसास
मैं आज भी
महसूस करती हूँ
मूंद आँखों को मैं
आज भी तुम्हें जीती
हूँ
मेरे उदास लम्हों में
मेरी तन्हाई के पलों में
होते हो तुम मेरे
बेहद करीब
मुस्कुराते हुए
बाँहों में अपनी मुझे
समाये हुए

मैं नही चाहती
पलकेँ उठाना
मैं नही चाहती
ख़्यालों से जगना
मैं चाहती हूँ तुम्हें
जी भर देखना
मैं चाहती हूँ तुमसंग
बस यूँही जीना

ये जो आँसू हैं
मेरी आँखों में
तेरी चाहत की
निशानी है
ये जो आह
तड़प है
मेरे सीने में
हमारे प्यार की
कहानी है

इक जनम तो होगा ऐसा
जो तू मेरे करीब होगा
होगी फ़िक्र मेरी भी तुझे
जब तू मेरा नसीब होगा__|||🌷

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अतीत का हिस्सा__|||

पथराई आँखों से
निहारती है वो
मुस्कुराती हुई
तस्वीरें अपनी
जो आज अतीत का
हिस्सा बन
समेट अपने
इतिहास को
जमा होकर
रह गईं हैं
मोबाइल के
फोल्डरों  में
वह अकसर
मोबाइल के
स्क्रीन पर तो
कभी किसी
डीपी में लगा
अपनी तस्वीर
उन लम्हों को
करके याद
चाहती है
कुछ पल को
बिलकुल वैसे ही
मुस्कुराना
लेकिन उसके
भावहीन होटों पर
हो हरकत कोई
इससे पहले ही
फूट पडती है
आँखों के कोरों से
इक धारा
अश्रुओं की
बिना उसके
अनुमति के
बस यूँही____|||#बसयुंही



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जो किया है वादा तुम संग__|||

विरह की ये दूरी ग़र मैं
सह न पाऊँगी
साथ न छोडूंगी मैं
साँस छोड़ जाऊंगी
मुहब्बत के मसले
यूँ सुलझाउंगी
देख तुझको
इक नज़र मैं
इश्क़ इश्क़ हो
जाऊंगी
जो किया है वादा
तुम संग
जन्म जन्म निभाऊंगी
इक पुकार पे तेरी मैं
दौड़ी चली आऊँगी
ग़म न करना ज़ाना
मेरे इन हालात का,
सम्भाल दिल में तुझे मैं
बसयूँही मुस्कुराउंगी
सदा से मैं हूँ तेरी
तेरी ही रहूंगी
सुनेगा इक दिन मुझे तू
मैं कुछ न कहूँगी~!!!

 💕





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कहो क्या कहोगे__??

करते हो तुम अक़सर तन्हाइयों में मुलाक़ातें उदासियों से जी भर बातें सुनाते हो तुम अपने ग़मगीन दिल की आँसू भरी वो रातें
ग़र मैं पूछूँ तुम्हें कैसी दिखती है ये उदासियाँ बताओ होती है क्या तन्हाईयाँ__? रखकर हाथ दिल पर संग ईमान का लेकर तुम कहो क्या कहोगे__?
तुम सोचोगे पन्नें किताबों के पलटोगे तुम ढूंढ़ोगे पंत्ति पंत्ति शब्द महंगे चुन लाओगे ताकि दे सको इक असरदार विवरण उन पलों का उन चेहरों का
जिन्हें तुंमने
जिया ही नही तन्हाईयों को महसूस किया ही नही तुम डालोगे जोर दिमाग़ पर उतारने को तस्वीर उनकी जिन उदासियों को तुमने कभी देखा ही नही___|||


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देव पुरुष___

चुपके से एक रोज़
रात अफ़साना सुना गया
ख़ामोशी में लिपटा 
इक राज़ अनोखा
मेरे दामन से बाँध गया
रौशन थे चाँद सितारे
पुरवाइयों की अठखेली
स्वर्णआभा से दमक रहा था
मुख मंडल उस देव तुल्य की
भाव विभोर थी प्रकृति सारी
झूम रहा था क़ायनात
चरण कमल प्रिय के देख़
मन गा उठा मधुर प्रेम राग़
हौले हौले ज्यूँ क़रीब आएं
आत्मा में समाते गएँ
वे दिव्य लोक के

देव पुरुष
धीमे धीमे मंद मंद मुस्काएं
वह चंद्रबदन तेज़ सूर्य का
कृपा सरस्वती जहाँ बिराज़े
वह चंचल मन शितल जन
हर मन को सदैव सुहाएँ
वो रात अनोखी
अहसास अनोखा
इक रंग नया
ज़ीवन को मेरे
लगा गया
चाँद उतरा जो

 ज़मी पे
रूह में मेरे समा गया........



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टूटी_फूटी_औरतें 2

वो लिखना चाहती है हर उस दर्द को जो वह बिना उफ़्फ़ किये मुस्कुराहट का मुखोटा पहन सहती रही____भीतर ही भीतर टूटती रही रिश्तों के भीड़ में तन्हा तन्हा घुटती रही___वह उतार देना चाहती है पन्नों पर उन अहसासों को जिसने उसे बनाकर कमजोर खोकला कर दिया____वो अक़सर रातों को उठ बैठती है लिखने को जब फ़र्ज़ सारा उसका सो रहा होता है
वो वही होती है जब दूसरा कोई नही होता है_____सम्भाल पन्नों को कलम वह उठाती है____अतीत की गलियों में फिर वो पहुँच जाती है_____उसे दिखती है अपनी माँ जहाँ ममता का कोई निशां नही वहीं दीखते हैं उसे पिता भी____नाम के आगे स्नेह का जहाँ कोई औकात नही_______वो बढ़ जाती है आगे लेकिन कदम दो बढ़ाते ही उसे दीखता है एक मंडप___मासूम मन उसका सोचता है कभी खुदको तो कभी अपने आसपास तलाशता है इक सहारा जो उसे थाम ले जो उसे बचा ले________वह निराश होती है मज़बूरियों से कर समझोता ससुराल पहुँचती है_____नये नये चेहरे अगल ही मिज़ाज़ बात बात पे ताना उड़ाना मजाक____शहर से बिलकुल भिन्न था गांव वालों का स्वभाव______वह रोती थी बिलखती थी क़िस्मत को कोसा करती थी कहने को तो अपना था पति पर वो उससे भी डरती थी_____मान नसीब अपना वो चुपचाप सबका कहा करती थी रातों को चोरी से आँसू बहाया करती थी_______|||#बसयूँही #टूटी_फूटी_औरतें #क्रमशः

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टूटी_फूटी_औरतें

शरीर की थकान जरा देर को आराम कर मिट जाता है____लेकिन इस मन की थकान का क्या किया जाये____दूर कहीं किसी वीराने में बस एक दिन को पनाह ढूंढता ये मन रोना चाहता है जी भर_____जहाँ न हो किसी सवाल का डर इक ऐसी जगह जाना चाहता है____बहुत थक चूका है ये मन अब इससे नही होता अभिनय अब इसे छुप छुपकर घुटकर आँसू बहाने से नही मिलता आराम____उसे चाहिए वो जगह जहाँ वो चीख़ सके दहाड़े मारकर रो सके____ताकि वह होकर तरोताज़ा फिर से लौट सके उस दुनिया में जहाँ दे सके कहानी को अंजाम अपने अभिनय से_____तन्हा होके भी तन्हा न होना जहर पीकर जिंदा रहना किस कदर टूट जाता है मन कभी महसूस तुम भी करके देखना____________________________किसी के बिना कोई काम नही रुकता बार बार इस बात को वह ख़ुदसे कहती रहती है जबसे उसने अपने अंदर हो रहे बदलाव को महसूस किया है_______उसकी पकड़ अब ढ़ीली पड़ती जा रही है_______नही वह डर नही रही उसे बस फ़िक्र है कुछ अधूरे कामों का_____लोग जिंदगी जीते हैं वो सारी ज़िंदगी मौत को जीती रही_____जिस सुक़ून भरी नींद को वो तरसती रही उम्र भर वह नींद उसे अपने करीब आती हुई महसूस होने लगी है______और उसकी आख़री ख़्वाइस उसे बेचैन किये हुए है जिसे अंजाम भी उसे खुद ही देना है________|||#क्रमशः #बसयूँही

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मुहब्बत के बाद.....

मुहब्बत हमारी ज़िन्दगी में आती है तो हमे बेहद खूबसूरत बना देती है , लेकिन जब यह हमारी ज़िन्दगी से वापस लौटती है तब यह हमे इस कदर बदसूरत बना जाती है कि हम खुदको भी इक नज़र देखना पसंद नही करते.....

जिन आँखों में रहते थे महबूब कभी
वहीं आज उदासियों का बसेरा है
जिन राहों में बिछी रहतीं थी पलके
वहीं आज मातमों ने डाला डेरा है

मुहब्बत निचोड़ ले जाती है खुशियां सारी....और ...दे जाती है....दर्द बेचैनी संग यादों कि क्यारी....जिसे पागल मन दिनरात सींचता है आंसू कि कतरों से....झुलसता है धुप से पानी में भींगता है ठोकर खा पत्थरों से लहू बहा वो हँसता है.....मुहब्बत कि गिरफ्त ऐसी...न वो जीता है न वो मरता है............................
मेरी नायिका......हंसती हँसाती गुमसुम हो गयी....मुहब्बत कि गलियो में जा वह बदल सी गयी.....करके अर्पण सर्वस्य अपना वो तृप अपनी मुहब्बत को कर न सकी.....बदल गयी उसकी दुनियां सारी मगर वो खुद बदल न सकी.....अथाह दर्द के सागर में वो तैरती है निरंतर ...गम अपना मगर वह किसी से बाँट न सकी.....आज भी उसकी वीरान आँखों में इंतज़ार है उस घड़ी कि जो लौटा लाये हंसी उसके लबों कि.....तस्वीर महबूब कि वो सिने से लगाए रहती है...आँखों में आंसू लिए दुआएं दिल से देती है....तन्हाई उसके दिल कि उसे रोज तिल तिल तड़पाती है....कभी तो खत्म होगी ये सज़ा यह सोच मन कि आस जगाये रखती है.........

न जाने कियूँ तेरी ओर दिल मेरा खिंचा चला जाये
तू नही मेरा फिर भी कियूँ यह दिल तुझी को चाहे




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नाम तेरा......

नाम तेरा जपते जपते
मैं जोगन बन जाऊँ
बन जा मेरा किशन कन्हैया
मैं राधा तेरी कहलाऊँ....

काँटों की सेज़ पिया
विरहन का भाग्य कहलाए
जो चल दे उस डगर वो
पार कहीं न पाए....

लौट के जो आओ प्रिय
बाँहों का हार बिछाऊँगी
देख देख सूरत तेरी
आँखों में खो जाऊंगी....!!! #बसयूँही

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