सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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रात की ख़ामोशी, और ये ठंडी लहरें पवन की
रोम रोम में ज्वाला सी उठ जाती है अगन की 
तन्हा चाँद, और ये उड़ती बदलियाँ गगन की
टूट टूट के रह जाती है हर अंगडाई बदन की

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