सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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कभी सूरज तो कभी चाँद बनके आये 
ए दोस्त आप मेरे जिंदिगी में बहार बनके आये 
कभी सूरज की तपिस से झुलसती हु मै तो 
कभी चाँद की ठंडक से संभलती हु मै 
जिंदिगी ने है क्या क्या रूप दिखाए 
कभी धुप तो कभी छाऊ में है मुझे पहुचाये 

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