सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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जल गयी तो मैं शमां हो जाऊँगी,
बुझ गयी तो फिर धुंआ हो जाऊँगी,
सह रही हूँ,जब तलक धरती हूँ मैं,
उठ गयी तो आस्मां हो जाऊँगी-

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