सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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क्या जानू क्या होता है शब्दों का गढ़ना ♥

क्या जानू क्या होता है शब्दों का गढ़ना
मैं तो बस जानू  इन शब्दों का मचलना 
तेरे नाम के साथ 
मचल उठते है इनके ज़स्बात 
तेरी यादों के नशे में 
बहक उठते हैं इनके कदम 

चल देते हैं उस डगर 
जहाँ ना पाने की आरज़ू
ना तो कुछ खोने का डर
मदहोश इन शब्दों को 
ना होती अपनी परवाह
नही होती दुनिया की 
कोई खबर ...
ये तो बस तेरे नाम के साथ 
मचल उठते है ...
तेरी यादों के नशे में बहक उठते हैं 
जों होती कभी इन शब्दों को  
तेरी दुरी का अहसास 
ये तड़प उठते हैं   
ये जल उठते हैं 
हाँ बस युही देहक उठते हैं ..
ये शब्द तो चाहें बस 
तेरी निगाहों से गुज़रना
के महसूस कर सको तुम 
इन शब्दों की तपीस ,
इन्हें भला इस दुनिया से 
क्या लेना देना ..
ये तो बस शब्द हैं 
नही आता जिसे मुझे गढ़ना...
ये तो बस तेरे नाम के साथ 
जी उठते हैं 
मचल उठते हैं 
बहक जातें हैं 




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1 comments:

Mohan Sethi 'इंतज़ार' said...

वाह अति सुंदर ....भावपूर्ण अभिव्यक्ती

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