सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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अँधेरा

ये अँधेरे इतने डरावने क्यूँ होते हैं।। इन अँधेरो में कोई दिखता क्यूँ नही क्या इसलिये नही दिखता क्यूँकी मैं अकेली हूँ।।मैंने ही तो चुना है इस अँधेरे में रहना फिर ये डर कैसा ये अँधेरे तो सबसे अच्छे हैं ना।। उन उजालों से तो अच्छे हैं जो बार बार इतने क्रुर बन हक़ीकत दिखा आँखों में आंसू भर देते हैं और ये अँधरे तो उन आंसुओ को दुनियां में मज़ाक बनने से बचा लेते हैं छुपा लेते हैं हमें अपने आप में जहाँ कोई हमें ना देख सके।।। इन अंधरों में तो सदियाँ गुज़ारनी है।। यूँही अकेले तन्हा।।।। फिर ये डर क्यूँ ये कैसा इंतज़ार।।। नही ये अँधेरा इस जीवन में अब कभी नही छटेगा नही आयेगी रौशनी कभी नही।। आदत का क्या है जैसी डालो डल जायेगी।। जब कुछ भी नही था ये अँधेरा ही था हर तरफ हर ओर।। जब कुछ ना होगा ये अँधेरा ही होगा चहुँ ओर।। हाँ मुझे पसंद है अँधेरा।।। मैं नही डरूँगी
मैं इन्ही अँधेरो में खुदको गुम कर दूंगी।। मुझे नही चाहिये उज़ाला बिलकुल भी नही।।। मैं किसीको नही दिखना चाहती।। खुदको भी नही।।। ऐसे में मन की बात इन अंधेरों के सिवा कौन सुन सकता है भला।।। यही तो हैं जो घेर लेते हैं चारों ओर से।। छुपा लेतें हैं अपनी बाँहों में बिना किसी भेदभाव के।।। मन मस्तिक को भी धीरे धीरे अपने ही रंग में स्याह करता जाता है।। जहाँ किसी और आकृति को पहचान पाना संभव ही नही।। मैंने चुन लिया है इसे।।। बस अब इंतज़ार ये सफ़र ख़त्म होने का।।।

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2 comments:

Sudheer Maurya 'Sudheer' said...

bahut khub..

निभा चौधरी said...

आप तो मुझे इतने सालों से जानते हैं और आपको पता भी है मैं अच्छा नही लिखती बस कुछ भी लिख देती हूँ फिर भी कह रहें हैं बहोत खूब।।।

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