सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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तुम ही कहो।।

सर्द बूंदों सा तुम्हारा प्रेम
मेरे रगो को जर्द करता गया
हौले हौले जाने कब कैसे
मेरे रूह पर काविज़ ये हो गया
प्रेम का वो आलिंगन
बेहोशी का वो आलम
क्षण क्षण तेरी याद में
छठपटा उठे है ये मन
कहने को तो भूल गयें
पर मुश्किल है इस जन्म

जिस दिल ने माना तुम्हें खुदा
तुम ही कहो कैसे करें तुम्हें जुदा।।

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2 comments:

डॉ. मोनिका शर्मा said...

प्रेमपगे भाव

निभा चौधरी said...

आभार मोनिका जी...

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