सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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थी छोटी मगर दिलचस्प बड़ी वो इश्क की दास्तां

थी छोटी मगर दिलचस्प बड़ी
वो इश्क की दास्तां
यूँही राह में मिल गये थे
दो राहगीर अंजान
छोटी छोटी सी बातें करके
वो काटने लगें सफ़र साथ
कभी दिन ढले कभी रात जगे
वो करने लगें एक दुज़े से बात
जाने कब कैसे पकड़ लिया
ऊन दोनों ने एक दुज़े का हाथ
समझने लगें थे बिन कहे
एक दुज़े के ज़ज्बात
रहते थे जब ख़ामोश जुबां
दिल से दिल की होती बात
मेल नही था जिस्मों का
थे वो रूह का हमराज़
भूल गये वो दुनियां के
सारे रश्मों रिवाज़
जीने लगें सुन इक दुज़े की
मीठी मीठी सी आवाज़
बिन बात के हँसना
बिन बात के हँसाना
इक दुज़े को खुश करने का
ना छोड़ते वो कोई बहाना
हो चला था इक दुज़े के साथ
वो सफ़र बड़ा सुहाना
दो दिवाने कुछ यूँही मिलें
हो दुनियाँ से बेगाना
चल रहें थे मंजिल से
हो बिलकुल अंजाना
************************
यूँही चलते चलते
करते थे जो सीरत की बात
ज्यों देखा उसने सुरत
बदल गया वो पल में
जो था प्रेम का मुरत
कोशिशे नाकाम रही
जाने की जो उसने ठानी
समझ ना पाई वो कभी
क्यूँ बंधी वो इस डोर
आ ही गया सफ़र में आखिर
 वो दर्दनाक मोड़
जाना था जहाँ से दो दिलों को
एक दुज़े को छोड़
धीरे धीरे बातों का
सिलसिला हुआ कम
नजरें भी चुराने लगा
वो थे जो हमदम
मुर गया वो मोड़ पे
छोड़ कर वो हाथ
पकड़ा था जिसे वो
देने को साथ
भूल गया वो सफर
सिलसिला पुराना
अंजान बन गया
फिर से वो अंजाना
सच की मूरत ने
झूठ का दामन पकड़ा
जाते जाते बहानों का
बक्सा  उसने थमाया
छोड़ जाने के लिए
क्या क्या जुगत भिड़ाया
देख ना सकी वो पगली
सनम की ये परेशानी
रख दिल पे पत्थर
उसे जाने देने की ठानी
रो पड़ी थी आंखे
देख उसको जाते
क्यूँ मिलतें हैं लोग वो
जिनसे ना कोई रिश्ते नाते
दूर तक तकती रही वो
उदास सी अँखियाँ
लौट पड़ी आखिर वो भी
याद करके उसकी बतियाँ
ना मिल पाएंगे कभी
इस दिल ने फिर जाना
देखते देखते आँखों से
ओझल वो हुआ
यादों एक कारवां
मेरे नाम कर गया

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3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आप अच्छा लिखती हो।
"आपका ब्लॉग" में लेखक के रूप में आपको आमन्त्रित कर रहा हूँ।
अपना मेल चैक कीजिए और आमन्त्रण स्वीकार करके यहाँ भी अपनी पोस्ट लगाइए।

निभा चौधरी said...

शुक्रिया आपका आपने हमें इस काबिल समझा... अभी मैं मेल देख लेती हूँ :)

Yudhisthar raj said...

बेहतरीन नज़्म लिखी है आपने !!!

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