सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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ऐ ख़ुदा अब तूं ही बता

जाने कबसे तरस रहें थे देखने को तेरी सूरत
नैनों से आज अश्क बह निकलें देख तेरी मूरत
जितने क़रीब थे हम उससे ज्यादा दूर हुए
वक़्त के हाथों देखो कैसे हम मज़बूर हुए
सोचा ना था ये कभी रूठ जायेगी हँसी
हो जायेंगे हम जुदा रोयेगी बेबसी
क्या मैंने ज़ुल्म किया है क्यूँ मुझे मिली सज़ा
जाना था जो दूर मुझसे क्यूँ तूं मुझको मिला
तेरी राहों में अब ना आयेंगे
यूँही रो रो मर जायेंगे
तुझे होगी ना ख़बर
पर देखेगा वो ख़ुदा
हर साँस तुझको याद करे
धड़कन हर पल नाम तेरा ले
दिन को ना चैन आये
रात को रतजगा
क्यूँ मिली मुझे सज़ा
ऐ खुदा अब तूं ही बता
तूं ही बता।।।।।।।

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7 comments:

संजय भास्‍कर said...

सुंदर रचना के लिए आपको बधाई

संजय भास्‍कर
शब्दों की मुस्कुराहट
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

निभा चौधरी said...

शुक्रिया आपका पसंद करने हेतु ........

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-06-2014) को "यह किसका प्रेम है बोलो" (चर्चा मंच-1638) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

निभा चौधरी said...

आभार सर।।।।।

Digamber Naswa said...

उसके खेल निराले होते हैं ... पर प्रेम हैजो रहता है हमेशा दिल में ...

dr.mahendrag said...

खूबसूरत प्रस्तुति निभाजी

निभा चौधरी said...

शुक्रिया............

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