सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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उलझी हुई है जिंदगी

उलझी सी रहती जिंदगी 
रिश्तें रूपी जालों में 
ये किया नही वो हुआ नहीं 
गुम रहती ख्यालों में 
वक़्त भी क्या क्या रंग दिखाए 
पल में हँसाए पल में रुलाये 
जिंदगी को अपनी ऊँगली पे नचाये 
कहते हैं खुबसूरत है जिंदगी 
जो झांको इसके दिल में 
बड़ी उलझी सी है जिंदगी 
रिश्तें रूपी जालों में 
फसी सी है जिंदगी 
कहने को कुछ भी कहें 
जीना है अपनों के लिए 
मूल मंत्र ये जिंदगी 
कोई नही सोचता ओरों के लिए 
जीतें सभी अपनों के लिए 
अपनी जिंदगी 
रिश्तें रूपी जालों में 
कभी फ़स जाती है तो 
कभी फसा देतें है हम जिंदगी 
उलझी हुई है जिंदगी 
उलझा देतें हम जिंदगी 

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8 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (10-06-2014) को "समीक्षा केवल एक लिंक की.." (चर्चा मंच-1639) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

निभा चौधरी said...

आभार सर ..........

मन के - मनके said...

जिंदगी उलझन तो है मगर है बहुत खूबसूरत.

Vaanbhatt said...

अत्यंत सुन्दर प्रस्तुति...

निभा चौधरी said...

शुक्रिया ................

mukesh sharma said...

सुँदर... नमन...

mukesh sharma said...

सुँदर... नमन...

con doc said...

उलझी सी रहती है ये जिंदगी,
रिश्तें रूपी भवरों में।।
ये किया नही वो हुआ नहीं,
गुम रहती है ये ख्यालों में।।
वक़्त भी क्या क्या रंग दिखाता है मुझको यहाँ,
पल में हँसाता और पल में रुलाता मुझको यहाँ।।
मुझको अपनी ऊँगली पर नचाती है ये जिंदगी,
फिर भी कहते हैं सब खुबसूरत है ये जिंदगी।।
रिश्तें रूपी भवरों में फ़सी हुई सी जिंदगी,
कभी अच्छी तो कभी बेकार है ये जिंदगी।।
कोई नही सोचता यहाँ ओरों के लिए,
सभी जीते यहाँ सिर्फ अपनों के लिए।।
इस जिंदगी के रिश्ते रूपी भवरों में
कभी फ़स जाती हूं में भी
कभी खुद ही फसा देती है मुझे जिंदगी।

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