सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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बस यूँही

ग़र कर सको महसुस तो हर धड़कन में मिलूँगी वरना में वो कहानी हूँ जो किसी धुल सनी
किताब में मिलूँगी

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4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (08-06-2014) को ""मृगतृष्णा" (चर्चा मंच-1637) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

निभा चौधरी said...

शुक्रिया ..............

संजय भास्‍कर said...

वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

निभा चौधरी said...

शुक्रिया आपका........

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