सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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कुछ यूँ भी....!!! :)

कानों में बाज़े मेरी
तेरी प्रेम की धुन
          मीठी~मीठी
प्यारी~प्यारी
     रुनझुन~रुनझुन

आओ गाएं प्यारे नगमें
हम तुम संग संग यूँही
गुन~गुन...गुन~गुन

नुपूर भी आज इतराए
संग जो तुम मुस्काए
छमके हैं कैसे देखो
छम~छम छम~छम

प्यार का दर्द अनोखा
दिया फिर दिल पर डेरा
धड़कनें धड़क उठी हैं
डम~डम डम~डम

प्रेम की हवा चली है
ख़ुशी हर ओर फ़ैली है
देख दिवानी नैना
बहे क्यूँ
क्षण~क्षण…क्षण~क्षण

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5 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (01-09-2014) को "भूल गए" (चर्चा अंक:1723) पर भी होगी।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Mukesh Kumar Sinha said...

बहुत सुन्दर...........

निभा चौधरी said...

शुक्रिया सर....

निभा चौधरी said...

धन्यवाद सर....!

आशीष भाई said...

बहुत ही सुंदर रचना व लेखन , निभा जी धन्यवाद !
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