सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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पहाड़ियां......!!!!!!!!!!

कभी कभी कोई कोई दिन बिलकुल इन पहाड़ियों सा महसूस प्रतीत होने लगता है 
हर अहसास को खुद में ज़ब्त किये हुए...चहल पहल से भरी इस दुनियाँ के बीच मौन 
खड़ी ये पहाड़ियाँ ना जाने कितनी ही बातें ना जाने कितने ग़मों से अंदर
ही अंदर
टूटती बिखरती...जिन्दगानियों से घिड़ी ये बेज़ान सी मूक पहाड़ियां...कोई भी तो 
नही समझने वाला इसकी पीड़ा इसकी चाहतें कहे भी तो किससे कहे ये अपनी 
मन की बातें....आते हैं अकसर सब इनके क़रीब कभी पशु पंछी तो कभी इंसान खुद.
सब आते हैं अपनी ज़रूरत के अनुरूप चाहिए होता है हर किसी को अपनी खुशियाँ 
कोई नही देखता कोई नही सोचता ना कोई समझता इन पहाड़ियों की कहानियाँ..
अस्त होता जाता है ज्यों ज्यों सूरज खत्म होती जातीं हैं पहाड़ियों के आसपास 
की चहल कदमी ये मूक पहाड़ियां खड़ी रहतीं हैं वही के वही कुछ सोचते हुए 
बस यूँही....!!!!!

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2 comments:

Deepika Shukla said...

मेरे मन की।।🙌

निभा चौधरी said...

:)

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