सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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अहसासों की गठरी लिए हर आदमी....!!!

अपने ही अहसासों क बोझ से...बेहाल आदमी
कौन समझे किसके अहसास...है व्यस्त आदमी
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गमगीन सा हो उठा मंज़र
            हँस रहा था यूँ दर्द ए दिल
जैसे हो आखरी ये सफ़र.....

अहसासों की गठरी लिए
           हर इन्सां गुज़रता रहा
दिल के क़रीब से
        सहेज़ सहेज़ उन अहसासों को
एक अहसास दम तोड़ता रहा
          बड़े ही ख़ामोशी से.....

दर्द की इन्तेहाँ हो गई
       जब सच बेज़ुबां हो गई
झूठ फ़रेव की नगरी में
    तड़प तड़प इक वफ़ा मर गई.....

काटों की सेज़ पे
    फूलों का अहसास लिए
वो सोई रही सुकूं से
         दुःख में भी हँसती रही
दर्द उसके मन का पर
किसी ने जाना...!!!

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3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-11-2014) को "वक़्त की नफ़ासत" {चर्चामंच अंक-1800} पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

निभा चौधरी said...

शुक्रिया सर....!!!

Deepika Shukla said...

बहुत खुब 🙆 जी।

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