सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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नेहा लगा के तोसे~~!!!

ख़ोया है चैन मैंने
खोई हैं खुशियाँ सारी
नेहा लगा के तोसे
पल पल हूँ मैं हारी
तेरे वास्ते जागी
सारी सारी रतियाँ रे
कहाँ गई वो तेरी
प्यार भरी बतियाँ रे
मारे हैं ताना सखियाँ
भर भर आये रे अँखियाँ
भूल हुई क्या मोसे
जो छोड़ दी कलाई रे
का से कहूँ~कैसे कहूँ रे
ग़म की दुनियाँ में
तन्हा तन्हा मरुँ रे
तेरे प्यार को साथी
जी के मैं मरुँ रे~~!!!

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8 comments:

Rahul Gautam said...

वाह.. अद्भुत। बधाई निभा जी।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार (07-04-2015) को "पब्लिक स्कूलों में क्रंदन करती हिन्दी" { चर्चा - 1940 } पर भी होगी!
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Nibha choudhary said...

शुक्रिया राहुल जी आपको यहाँ देख़ ख़ुशी हुई~~!!!

Nibha choudhary said...

धन्यवाद मयंक जी~स्थान देने हेतु आभार आपका~~!!!

sarita hooda said...

शब्दजाल बुनने की कला में महारत हासिल है तुम्हें..
वरना स्वर व्यंजन तो हमने भी सीखे थे..

सु-मन (Suman Kapoor) said...

प्यारी रचना ...फॉन्ट जरा बड़ा कर लें (कृपया अन्यथा ना लें)

Nibha choudhary said...

शुक्रिया दी~आपने बहुत बड़ी बात कह दी मैं इस क़ाबिल तो नही बस यूँही कोशिश करती रहती हूँ :)

Nibha choudhary said...

धन्यवाद सुमन जी~आपको पसंद आई ये मेरे लिया बेहद ख़ुशी की बात है और फॉन्ट के बारे में बताने के लिए हृदय से आभार~ :)

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