सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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इक पत्ती हुई डाल से ज़ुदा~!!!

एक पत्ती थी उस डाल पे
हवा के झोंके संग लहराती थी
कभी इतराती कभी बलखाती
झूम झूम ख़ुशी से गाती थी____

मौसम बदला पतझड़ आया
डाल ने अपना धर्म निभाया
ज़मी पे पड़ी रही वो पत्ती
सुखती रही कुचली गयी
हवा के झोंकों संग फिर वो
भटकती रही भटकती रही_____

सूर्य का प्रचंड तेज़
पत्ती की शक्ति क्षीण हुई
आग की लपटों में वह
डाली की याद में जल गई
स्वाहा हुई_______

लौट आती है बाहार फ़िरसे
नई पत्तियों से शाख़े सज़के
ना करता शाख़ उस पत्ती को याद
जितनी किस्मत बस उतना साथ~!!!

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6 comments:

Mohan Sethi 'इंतज़ार' said...

बहुत भावपूर्ण रचना ...सादर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-06-2015) को "विश्व पर्यावरण दिवस" (चर्चा अंक-1998) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
विश्व पर्यावरण दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Nibha choudhary said...

शुक्रिया मोहन जी~!!!

Nibha choudhary said...

सर चर्चा मंच में शामिल करने हेतु आभार आपका~!!!

Onkar said...

सच कहा

Nibha choudhary said...

शुक्रिया सहमत होने के लिए~!!!

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