सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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इक रात~!!!

चुपके से इक रोज़
रात अफ़साना नया
सुना गया
ख़ामोशी में लिपटा
एक राज़ अनोखा
मेरे दामन से बाँध गया

रौशन थे चाँद सितारे
पुरवाइयों की अठखेली
स्वर्णआभा से दमक रहा था
मुख मंडल उस देव तुल्य की
भाव विभोर थी प्रकृति सारी
झूम रहा था क़ायनात
चरण कमल प्रिय के देख़
मन गा उठा मधुर प्रेम राग़

हौले हौले ज्यूँ क़रीब आएं
आत्मा में समाते गएँ
वो दिव्य लोक के देव पुरुष से
धीमे धीमे मंद मंद मुस्काएं

वह चंद्रबदन तेज़ सूर्य
कृपा सरस्वती जहाँ बिराज़े
जो चंचल मन शितल जन
हर मन को सदैव सुहाए

वो रात अनोखी

अहसास अनोखा

इक रंग नया

ज़ीवन को मेरे

लगा गया

चाँद उतरा जो

दिल के ज़मी पे

रूह में मेरे समा गया~!!!#बसयूँही

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4 comments:

Onkar said...

उम्दा रचना

Nibha choudhary said...

शुक्रिया आपका

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (27-09-2015) को "सीहोर के सिध्द चिंतामन गणेश" (चर्चा अंक-2111) (चर्चा अंक-2109) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Nibha choudhary said...

चर्चामंच में शामिल करने के लिए आभार आपका आदरणीय शास्त्री जी~!!!

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