सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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मुँह चिढ़ाती तस्वीर__|||

कुछ ही पल तो हुए थे
वह अपनी तस्वीर जो
तुमने मुझे दी थी मुँह
चिढ़ाती हुई, अचानक
उस तस्वीर को देख मैं
अपनी हँसी रोक न पाई
यकीं सा हो चला था
तुम्हारे दिल में अपने होने का
तुम्हारे कहे हर शब्द का
नये साल में तुम्हारे बदलाव का
तुम्हारे प्यार की सच्चाई का
फिर कभी न छोड़ जाने के
वादे का ,तुम्हारे जीवन में
मेरी ज़रूरत का,एक तस्वीर
इक पल और ढ़ेरों ख़ुशफैमीयों
संग मैं बहुत खुश हो
हँस रही थी ,
लेकिन यह क्या
अभी तो मैं जी भर
हँसी भी न थी के तस्वीर ने
अपना भाव बदल लिया
होंठो की हँसी मेरी आँखों में
बन आँसू बहने लगा, अब 
रोज सुबह मुँह चिढ़ाती
तुम्हारी तस्वीर तुममें
मुझे मेरे वज़ूद का
अहसास करा जाती है
और मैं बहा चंद आँसू के कतरे
खुदको व्यस्त कर दर्द से बचने
की अथाह कोशिशों में लग जाती हूँ__|||#बसयूँही :)



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1 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज रविवार (22-01-2017) को "क्या हम सब कुछ बांटेंगे" (चर्चा अंक-2583) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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