सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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प्रतिबद्धता #पाश

हम झूठ मूठ का कुछ भी नहीं चाहते 
जिस तरह हमारी माँसपेशियों में मछलियाँ हैं
जिस तरह बैलों की पीठ पर उभरे
चाबुकों के निशान हैं जिस तरह कर्ज़ के कागज़ों में
हमारा सहमा और सिकुड़ा हुआ भविष्य है
हम ज़िंदगी, बराबरी या कुछ भी और
इसी तरह सचमुच का चाहते हैं
जिस तरह सूरज हवा और बादल
घरों और खेतों में हमारे अंग-संग रहते हैं
हम उसी तरह हुकूमतों, विश्वासों और खुशियों को
अपने साथ साथ देखना चाहते हैं
ताकतवरों, हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते हैं
हम उस तरह का कुछ भी नहीं चाहते
जैसे पटवारी का ‘ईमान’ होता है
या जैसे किसी आढ़ती की कसम होती है-
हम चाहते हैं अपनी हथेली पर कोई इस तरह का सच
जैसे गुड़ की पत्त में ‘कण’ होता है
जैसे हुक्के में निकोटिन होती है
जैसे मिलन के समय महबूब के होंठों पर
मलाई-जैसी कोई चीज़ होती है
हम नहीं चाहते
पुलिस की लाठियों पर टंगी किताबों को पढ़ना
हम नहीं चाहते
फौजी बूटों की टाप पर हुनर का गीत गाना
हम तो वृक्षों पर खनकते संगीत को
अरमान-भरे पोरों से छूकर देखना चाहते हैं
आंसू गैस के धुएं में नमक चाटना
या अपनी ही जीभ पर अपने ही लहू का स्वाद चखना
किसी के लिये भी मनोरंजन नहीं हो सकता
लेकिन हम झूठ मूठ का कुछ भी नहीं चाहते
और हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते हैं
ज़िंदगी, समाजवाद या कुछ भी और...
#पाश

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2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-04-2017) को
"आस अभी ज़िंदा है" (चर्चा अंक-2625)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar said...

सार्थक रचना

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