सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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इक सफर___|||

मासूम सा प्रेम मेरा 
परिपक्य हो गया 
वक़्त के थपेड़ो से 
सख्त हो गया
 किया न गया तुमसे
कदर इस दिल की
आंखे देखों मेरी 
सुखकर बंजर हो गया
कहा न गया तुमसे

लफ्ज़ दो प्यार भरे 
दर्द देखो मेरा पिघलकर
समंदर हो गया
तुम्हे सोच खुश 
होता है दिल 
वर्षों का प्यार जिसका 
रेत हो गया
एक नाम था जो
तुमसे जुड़ा 
देखो जीवन से तुम्हारे 

वह आज मिट चला___|||



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6 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-06-2017) को
"प्रश्न खड़ा लाचार" (चर्चा अंक-2640)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Nibha choudhary said...

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय शास्त्री जी

राकेश कुमार श्रीवास्तव राही said...

आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/06/22.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

Nibha choudhary said...

बहुत शुक्रिया आपका राकेश जी💐

Sudha Devrani said...

बहुत सुन्दर...।

Dhruv Singh said...

लफ्ज़ दो प्यार भरे
दर्द देखो मेरा पिघलकर
समंदर हो गया
तुम्हे सोच खुश
होता है दिल
वर्षों का प्यार जिसका
रेत हो गया
बहुत ख़ूब ! सुन्दर शब्द विन्यास , भावनाओं का सही तालमेल आभार। ''एकलव्य"

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