सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
RSS

तलाश___|||

वह बेज़ान पड़ी घूर रही है
घर की दीवारों को
कभी छत को कभी उस छत से
लटक रहे पंखे को
उसकी नजरें तलाश रहीं है आज 
उन नजरों में परवाह जरा सी
अपने लिए
जिनकी परवाह को वह
खुदको बिसार गई
वो ढूंढ रही है उनकी बातों में
ज़िक्र जरा सी अपने लिए
जिनकी फ़िक्र कर वह
दिन रात मरती रही,
अंतः
कुछ न मिला कहीं उसे
घूँट आंसुओं की पीती रही
खाली हाथों की लकीरों को देख
बस यूँही मुस्कुराती रही
दीवारों से करके बातें दिल की
बोझ दिल का कम करती रही__|||#बसयूँही


  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

2 comments:

Onkar said...

बहुत सुन्दर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-06-2017) को
"रेत में मूरत गढ़ेगी कब तलक" (चर्चा अंक-2643)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Post a Comment